ग़ज़ल: वो हुस्न अपनी ग़ज़ल के रचाव में रखना
📅 26-07-2021 11:31 AM
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कविता
<p>ज़की तारिक़ बाराबंकवीसआदतगंज,बाराबंकी,उत्तर प्रदेश</p>
<p>लगाए दिल को किसी के लगाव में रखनाफ़क़त है ख़ुद को हमेशा तनाव में रखना</p>
<p>बड़ा अजब है ज़माना है कहता इश्क़ इसेकिसी के दिल से दिल अपना मिलाव में रखना</p>
<p>जो सब को खींच ले दीवाना कर के अपनी तरफ़वो हुस्न अपनी ग़ज़ल के रचाव में रखना</p>
<p>है मेरा मश्विरा थोड़ी सी नर्मी ऐ हमदमतुम अपनी जिन्से-मोहब्बत के भाव में रखना</p>
<p>पता है जिस में है अख़लाक़ क़ीमती है बहुतमगर ये पलड़ा हमेशा झुकाव में रखना</p>
<p>न झूमर और न गुलदान की ज़रूरत हैमुझे तो उस को है घर के सजाव में रखना</p>
<p>इस अपने हुस्न के जाहो-जलाल के दम परतुम्हें तो सिर्फ़ है आता दबाव में रखना</p>
<p>तू जिस को फ़ैसल-ए-तर्के-क़ुर्ब कहता हैये तो है सैले-लहू को जमाव में रखना</p>
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